Original Poem
जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे मैं उनसे मिलने उनके पास चला जाऊँगा। एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर नदी जैसे लोगों से मिलने नदी किनारे जाऊँगा कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब असंख्य पेड़ खेत कभी नहीं आएँगे मेरे घर खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा। जो लगातार काम में लगे हैं मैं फ़ुरसत से नहीं उनसे एक ज़रूरी काम की तरह मिलता रहूँगा— इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा।
Translation (Hindi)
About the Poet
विनोद कुमार शुक्ल (आधुनिक काल)
विनोद कुमार शुक्ल एक प्रमुख हिंदी कवि और लेखक हैं। उनका साहित्यिक कार्य आधुनिक हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान देता है। उनकी कविताएँ और कहानियाँ सरल भाषा में गहरी भावनाओं को व्यक्त करती हैं।
Historical Context
- Literary Form
- कविता
- When Written
- आधुनिक काल
- Background
- यह कविता मानव जीवन की जटिलताओं और सरलता के बीच के संघर्ष को दर्शाती है। इसमें कवि ने उन लोगों और स्थानों के प्रति अपनी इच्छा व्यक्त की है जो उनके जीवन में कभी नहीं आएंगे।
Sources: https://www.hindwi.org/kavita/jo-mere-ghar-kabhi-nahin-ayenge-vinod-kumar-shukla-kavita, https://www.kaavyaalaya.org/jo-mere-ghar, https://kavitakosh.org/kk/जो_मेरे_घर_कभी_नहीं_आएँगे_/_विनोद_कुमार_शुक्ल, https://www.amarujala.com/kavya/kavita/vinod-kumar-shukl-hindi-kavita-jo-mere-ghar-kabhi-nahin-aayenge-2023-04-16
Detailed Explanation
Themes
Literary Devices
Word Dictionary
| Word | Meaning | Translation | Transliteration |
|---|---|---|---|
| उफनती | बहती | जो तेज़ी से बह रही हो | ufanati |
| चट्टानें | पत्थर | बड़े पत्थर | chattaan |
| असंख्य | बहुत सारे | गिनती से बाहर | asankhya |
| खेत-खलिहानों | खेती के स्थान | जहाँ खेती होती है | khet-khalihanon |
| फ़ुरसत | आराम | खाली समय | fursat |
| आख़िरी | अंतिम | जो सबसे अंत में हो | aakhiri |
| इच्छा | चाहत | मन की चाह | ichchhaa |
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